वर्ड प्रेस पर आलसी

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वह गढ्ढा : कहानी में ट्विस्ट

आप से विदा लेने के बाद जब मैं इस गड्ढे के पास पहुँचा तो उसमें से झाँकते वाल्व को देख कर मुझे अपने अनुमान पर गर्व हुआ। वह तीसरे प्रकार का ही गड्ढा था। थोड़ी दूर पर सीवर का बजबजाता पानी नाली में देख कर यह पक्का हो गया कि नगर निगम इस बार विकास खण्ड में खाली भू खण्डों पर रहने वाले गरीबों पर मेहरबान है और उनका अच्छा स्वास्थ्य सुनिश्चित करने के लिए सीवर और पानी सप्लाई को मिलाने के लिए दृढ़ संकल्प है।


एक रिटायर टाइप सज्जन वहीं टहल से रहे थे। जिस गड्ढे की खोज खबर पिछ्ले कई महीनों से किसी ने नहीं ली, उसकी इतनी बारीक जाँच पड़्ताल होती देख वे मेरे पास आए। मैं उत्साहित होकर बोला, देखिए कितना खतरनाक गड्ढा है! उन्हों ने पहले हिकारत से मेरी तरफ ऐसे देखा जैसे मेरे इतना नादान आदमी उन्हों ने देखा ही न हो, फिर बोले:

यह गड्ढा नहीं एक खुला हुआ कलवर्ट है। टेक्निकली वह सही थे और मैं अपनी इंजीनियरिंग ताक पर छोड़ आया था। संकट की स्थिति आन पड़ी थी। मुझे बड़ा गुस्सा आया, इस शख्स को इस स्थिति से कोई आपत्ति नहीं लेकिन गलत नाम देने पर है। लिहाजा ऐसे असामाजिक आदमी को परास्त करने के लिए मैंने साहित्यकार और दार्शनिक दोनों मुद्राएँ एक साथ बनाईं, बोला:

ऐसी हर चीज जिससे इंसान के पतित होने की सम्भावना हो, उसका गड्ढे से अधिक उपयुक्त कोई और नाम हो ही नहीं सकता“। मेरे अचानक बदले तेवर और मुद्रा देख कर उन्हों ने बात बदल दी:

आप को लगता होगा कि यह नगर निगम की काहिली है। असल में यह नगर निगम और परिवहन विभाग का पारस्परिक सहयोग प्रोग्राम है।

मुझे ऐसी बात की उम्मीद कत्त्तई नहीं थी। भकुआ गया। यह तो नया ट्विस्ट हुआ।

भला परिवहन विभाग को इस महीनों से खुले गड्ढे से क्या लेना देना?”

यही तो बात है जिसे जनता नहीं समझती। आप लोगों को क्या मालूम कि जनता के हित में इन विभागों वाले क्या क्या करते रहते हैं?”

“?”

मुझे खासा परेशान और कन्फ्यूज देख उन्हों ने एक सवाल दाग दिया:

अच्छा बताइये इस सड़क पर कितनी ही छोटी छोटी दुर्घटनाएँ होती रहती हैं। कभी आप ने सोचा क्यों?”

“!!@#$*”

ऐसा है इस कॉलोनी में अचानक ही कार चलाना सीखने वालों की संख्या बढ़ गई थी जिससे दुर्घटनाएँ हो रही थीं।इस गड्ढे से उन पर अंकुश लगा है, लोग ज्यादा सतर्क हो चलने लगे हैं।

ऐसा कहते हुए उन्हों ने सड़क के दूसरी तरफ किनारे पर कलवर्ट से ही झाँकते करीब एक सवा इंच ऊँचे छ्ड़ के टुकड़े की तरफ इशारा किया। वह मेरा बहुत ही जाना पहचाना खास था क्यों कि हमेशा कार वहाँ से निकालते समय मेरा ध्यान उस पर रहता है कि कहीं टायर में घुस कर पंक्चर न कर दे।

आप उस छड़ और गड्ढे के बीच की दूरी का अनुमान लगाइए। एकदम इतनी है कि एक सामान्य कार निकल सके। यह भी ग़ौर कीजिए कि यह एक चौराहा है, और यहाँ से विकास खण्ड की तरफ मुड़ना भी पड़्ता है। ऐसा इसलिए किया गया है कि सीखने वाले सँभल कर चलें और साथ ही यहाँ से गाड़ी निकालने की कठिन परीक्षा को पास कर, लाइसेंस देने के पहले होने वाली तुच्छ विभागीय परीक्षा को अवश्य उत्तीर्ण कर लें।

कहते हैं कि जब मुहम्मद के उपर आयतें उतरी थीं, वे काँपने लगे थे और विवेकानन्द तो ज्ञान प्राप्त करते समय सुध बुध ही खो बैठे थे। मेरी तो औकात ही क्या?

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ज्ञान की इस झंझा से उबर कर जब होश में आता हूँ तो देखता हूँ कि वह सज्जन जा चुके हैं।मन ही मन उस अनाम गुरु को प्रणाम करता हूँ और नए नए प्राप्त ज्ञान की प्रशांत संतुष्टि के साथ घर की ओर चल पड़ता हूँ। सोचता हूँ व्यंग्य लिखना छोड़ दूँ।

May 27, 2009 - Posted by गिरिजेश राव | गड्ढा, गढ्ढा, गोमती नगर, नगर निगम, लखनऊ, विकास खण्ड, व्यंग्य | | 5 Comments

5 Comments »

  1. सुध बुध तो हम भी खो बैठे ऐसा ज्ञान प्राप्त कर के.

    Comment by Udan Tashtari | May 27, 2009 | Reply

  2. ज्ञान-चक्षु मेरी भी खुल गई पढ़कर! गड्ढा विज्ञान इतना गहन-गूढ़ है, यह अब पता चला। व्यंग्य लिखना अभी न छोड़ें, इस गड्ढे में और भी रहस्य छिपे हुए हैं उद्घाटन करने के लिए।

    Comment by बालसुब्रमण्यम | May 27, 2009 | Reply

  3. मेरे इस ब्लॉग और वेबसाईट पर देखे की क्यों दुनिया भर के खास तौर पर पढ़े लिखे लोग इसलाम कुबूल कर रहें हें

    Comment by islamicwebdunia | May 29, 2009 | Reply

  4. @islamicwebdunia

    आप का यह पोस्ट यहाँ अप्रासंगिक है। उत्तर दे रहा हूँ यह मान कर कि आप यहाँ फिर आएँगें।
    जहाँ तक उबूलने-कबूलने की बात है तो स्नायु और मस्तिष्क दौर्बल्य का उपचार कराना चाहिए। इधर उधर भागने से कोई लाभ नहीं होता। वैसे भी जो इस्लाम कुबूल चुके हैं, वे बेचारे तो उसे चाह कर भी छोड़ नहीं सकते, सर कलम कर दिया जाएगा।

    लिहाजा उनके पास बौद्धिक रूप से शून्य हो कर उसका महिमा मण्डन करने के अलावा कोई रास्ता नहीं है।

    एक अनुरोध है कि अप्रासंगिक पोस्ट भेज कर ब्लॉग की गरिमा का हनन न करें।

    Comment by गिरिजेश राव | May 30, 2009 | Reply

  5. गढ्ढा चर्चा जारी रहे।

    यह गढ्ढा तो ‘सीवर मिश्रित पेयजल’ का श्रोत कम और विशिष्ट ज्ञान का श्रोत अधिक साबित हो रहा है।

    जमाए रहिए जी।

    Comment by सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी | June 5, 2009 | Reply


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