जोगीरा सरssरsर – 1

इस ब्लॉग पर फाग महोत्सव जारी है। अब तक की ये प्रविष्टियाँ हैं:
(1) बसन तन पियर सजल हर छन
(2) आचारज जी
(3) युगनद्ध-3: आ रही होली
उत्तर भारत के उन क्षेत्रों में होली में कबीरा और जोगीरा गाने की परम्परा रही है जहाँ कभी नाथपंथी योगी और कबीरपंथी सक्रिय रहे। प्रचलित कुरीतियों और परम्पराओं पर इन लोगों ने तीखे प्रहार किए। प्रतिक्रिया में जनता ने होली के अवसर पर गाए जाने वाले अश्लील गीतों में उन्हें सम्मिलित कर लिया। इन क्षेत्रों में यह परम्परा पहले से भी थी कि नहीं यह संस्कृत, पाली, प्राकृत और लोकवाणी के ज्ञानी जन ही बता पाएँगे।  

मुझे लगता है यह परम्परा क्षेत्रीय रही है क्यों कि सूरत और सिलवासा में मैंने होलिका की केवल विधिवत पूजा होते देखी है। यहाँ तक कि नव विवाहित जोड़े गाँठ बाँध कर परिक्रमा भी करते हैं। श्रीमती जी बता रही हैं कि लखनऊ में भी केवल पूजा होती है। अस्तु..
इन जोगीरों और कबीरों में अश्लील गायन के अलावा हास्य, व्यंग्य, अन्योक्ति और प्रश्नोत्तर शैली में सामाजिक और राजनैतिक मुद्दे तक उठाए जाते रहे हैं। ब्लॉग पर भी ऐसा होना ही चाहिए। मैंने लम्बी सोची थी लेकिन कुछ समयाभाव और कुछ तत्काल की प्रबलता, इसे शृंखलाबद्ध निकालना तय किया ।
मौसम खराब होने की तमाम भविष्यवाणियों और उनके प्रशंसात्मक अनुमोदनों के बावजूद आज भी लखनऊ में जब प्रफुल्लित अरुणोदय देखा तो अपने को रोक नहीं पाया :)  
प्रथम कड़ी अदा जी की इस पोस्ट पर आई एक टिप्पणी को लेकर है। आप लोग भी टिप्पणियों या लेख कविता के माध्यम से फगुनी बयार को फैलाने में सहयोग दें। एक बात का ध्यान रखें कि अश्लीलता न आए, महिलाओं का अपमान न हो – उल्लास में अपमान और अश्लीलता का क्या काम? छींटाकशी फुहार जैसी हो , तीखी हो तो भी गुदगुदाती हो। कठिन काव्य कर्म है यह – लखेरई नहीं। 
उनकी कविता की सम्बन्धित पंक्तियाँ ये हैं:
“बड़ा है कौन यां ग़र तुम, कभी इस बात को सोचो
चमारों के छुए पर ये बिरहमन क्यूं नहाते हैं..?”


 टिप्पणी और प्रतिटिप्पणी साइड के स्क्रीनशॉट में लगी हैं।  







और अब जोगीरा:
के बाति के तान बनल बा के बाति के बाना ?
के बाति के जाति बनल बा के बाति के दाना ?
अदा बाति के तान बनल बा जुदा बाति के बाना
बिना बाति के जाति बनल बा दिलफुलवा पगलाना।
देखs खाली दाना..
.. हा जोगीरा सरssरsर

आभासी संसार का होलिका दहन

जो आ रही है वह ब्लॉगरी प्रारम्भ करने के बाद की मेरी पहली होली होगी। छोटे समयांतराल में ही मैंने हिन्दी ब्लॉगरी को समृद्ध होते देखा है – एक से बढ़ कर एक नगीने जुड़ते रहे हैं। इस आभासी संसार में उत्सव भी तो होने चाहिए। होली आ रही है, क्यों न यहाँ भी मनाएँ ?
आप को पता ही होगा कि होलिका दहन के दिन शरीर में उबटन लगा कर उसकी झिल्ली (छुड़ाया हुआ भाग) होलिका के साथ जला दी जाती है।मंगल कामना रहती है कि घर के हर सदस्य के सारे दु:ख दर्द भस्म हो जाँय।
.. ब्लॉगरी को घर परिवार मानने से कई वस्तुनिष्ठ लोगों को आपत्ति हो सकती है लेकिन फागुन बयार शास्त्रीयता की परवाह ही कहाँ करती है ! जैसे घर के सदस्यों में होता है, मन में ढेर सारा अवसाद का कूड़ा इकठ्ठा हो गया है। कतिपय चर्चाएँ,टिप्पणियाँ और लेख आप के लिए कष्टकारी रहे होंगे। दिख ही रहा है कि बात अब न्यायालय के द्वार पहुँचाने की हो रही है। ऐसे में एक निवेदन है – उन लोगों से जो स्वार्थ वश भद्दी चर्चाएँ, लेख और टिप्पणियाँ करते, लिखते रहे हैं और उनसे भी जो इन सबसे सुलगते रहे हैं, कष्ट पाते रहे हैं – सारे छ्ल, अमंगल, दुर्वाद, कष्ट, क्रोध, आभासी संसार की होलिका में जला दें। उल्लास की नई हवा बह चले। 
पुन: आपसी संवाद की बसंती बयार बह चले।
इस पुनीत कर्म के लिए एक ई मेल पता सृजित किया गया है:
स्पैम से बचने के लिए चित्र में दिखाया गया है। आप को टाइप करना पड़ेगा। 
अपने सारे छ्ल, अमंगल, दुर्वाद, कष्ट, क्रोध इस पते पर भेज दें। उन्हें भेजने के साथ ही उनसे मुक्त हो जाँय। बढ़िया हो  कि जिनसे कष्ट है और जिन्हें कष्ट दिया है, उन्हें मेल, फोन द्वारा – “बुरा न मानो” कह कर हँस हँसा लें।
होलिका दहन के दिन इस आभासी संसार की आभासी होली जलेगी जिसमें सारी नकारात्मक बातों, भावनाओं को भस्म कर दिया जाएगा। कृपया गालियों को होलिका दहन  के दिन चौराहे पर गाने के लिए बचा कर रखें, उन्हें मेल न करें।
मेरे कविता ब्लॉग पर फाग महोत्सव जारी है। शुरुआत यहाँ से है, आगे भी रचनाएँ हैं और जारी भी रहेंगीं  आनन्द उठाते रहें – लेख, कविता, फाग गीत, बन्दिशों का भी और टिप्पणियों का भी। 

युगनद्ध -3: आ रही होली

सड़क पर बिछे पत्ते
हुलस हवा खड़काय बोली
आ रही होली।


पुरा’ बसन उतार दी
फुनगियाँ उगने लगीं
शोख हो गई, न भोली
धरा गा रही होली।


रस भरे अँग अंग अंगना
हरसाय सहला पवन सजना 
भर भर उछाह उठन ओढ़ी 
सजी धानी छींट चोली। 


शहर गाँव चौरा’ तिराहे
लोग बेशरम बाग बउराए
साजते लकड़ी की डोली 
हो फाग आग युगनद्ध होली । 

आचारज जी

फाग पर्व शुरुआत यहाँ से है। 
फिर इहाँ 
फिर इहाँ। 
और अब नीचे ताकिए।
आप भी योगदान कर सकते हैं इस संक्रामक रोग को फैलाने में ।
इंटरनेट पर भी बसंत में आम बौराना चाहिए। रंग है, हुड़दंग है। 

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फागुन आइल आचारज जी
लागे पहेली सोझ बतियाँ आचारज जी
अरे, आचारज जी।
 
नेहिया ले फन्दा मदन बौराया
मदन बौराया मदन बौराया
तेल पोतलें देहियाँ आचारज जी
न खाएँ गुलगुल्ला आचारज जी
आइल फागुन लखेरा आचारज जी।

बिछली दुअरवा लगन लग घूमे
लगन लग घूमे लगन लग घूमे
ताकें हमरी रसोइया आचारज जी
न खाएँ गुलगुल्ला आचारज जी।

मकुनी औ मेवा रोटी पकवलीं
चटनी पोत बिजना परोसलीं
बरजोरी से आए आचारज जी
अरे, आचारज जी।
चटकारा ले खाएँ आचारज जी
जो देखे कोई थूकें आचारज जी

न खाएँ गुलगुल्ला आचारज जी।

अरे आचारज जी। 

बसन तन पियर सजल हर छन

यह कविता देवेन्द्र जी के इस गीत को पढ़ने से उपजी है।
हमरा कउनो कुसूर नाहीं है।
इसमें किसी के लिए छिपा सन्देश भी है। आशा है समझ जाएँगें।

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बसन तन पियर
सजल हर छन।

हरख हरखन
टुटल बरत
नवरतन बरजन ।

मदन अगन मगन मन
हर मन सगुन धुन
गुन गुन ….

ह म श टुन टुन
खदकत अदहन धुन!
..अवगहन


बसन तन पियर
सजल हर छन
छन छ्न …

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सरलार्थ:

बसन – वस्त्र, पति
पियर – पीला, प्रिय
सजल – नवरस से भरा, सजा हुआ
छ्न – क्षण, छन छन की ध्वनि
हरख – हर्ष
हरखन – प्रसन्नता
टुटल – टूट गया
बरत – व्रत
नवरतन – नवरात्र, नव-रति
बरजन – वर्जना
अगन – अग्नि
सगुन – शुभ आगम का संकेत
खदकत – खौलता हुआ
अदहन – चावल पकाने के लिए चूल्हे पर चढ़ाया हुआ खौलता पानी
अवगहन – अवगाहन, कोई बात जानने या समझने के लिए उसके संबंध में की जानेवाली खोज, छान-बीन या मनन

गिरिजेश रिपोर्टिंग – मछली बाजार से …

मछलियाँ – सम्भवत: एकमात्र जीव जिनके सान्निध्य में समूचे विश्व में मानव समाज की एक जाति ही बन गई – मछुआरे। दूर देश की यात्राओं में नदियों की भूमिका ने मछुआरों मल्लाहों को गरिमा दी। विश्व सभ्यता, इतिहास और साहित्य के विकास में मछलियों और मछुआरों का बड़ा योगदान रहा है। IMG222-01
आज के दौर में भी करीब रोज ही मन में आ ये पंक्तियाँ उसे जाने कैसा कर जाती हैं:
एक बार फिर जाल फेंक रे मछेरे, जाने किस मछली में बन्धन की चाह हो !”
और फिर बर्मन दा का “ओ रे माझी… मेरे साजन हैं उस पार ..”
… भारतीय सन्दर्भ देखें तो वर्ण और  जाति व्यवस्था पर बड़ी रोचक बातें नज़र आती हैं। मत्स्यगन्धा धीवर कन्या के साथ नाव में पराशर का संयोग और जन्म कृष्ण काया, द्वीप के निवासी द्वैपायन का जो व्यास बना। ऋचाओं को संहिताबद्ध किया, अथर्वण परम्परा को त्रयी परम्परा में स्थान दिलाया और रच गया वह महाकाव्य जैसा फिर नहीं रचा जा सका – महाभारत।
… ब्राह्मण पिता और मछुआरिन माता के संयोग का सुफल द्वैपायन कुरुओं और भरतों की गर्वीली क्षत्रिय परम्परा के लिए नियोग द्वारा संतति देता है – पांडु और धृतराष्ट्र। अपने समय का सर्वश्रेष्ठ ऋषि बनता है – मछुआरिन का बेटा।  
कहाँ हो जाति और वर्ण शुद्धता के धुरन्धरों !
.. आज कृषि की वैश्य परम्परा अपनाए ब्राह्मण, क्षत्रिय, भूमिहार … सब एक जाति हो गए हैं – खेतिहर।
मिल गए हैं कोइरी, कुर्मी, आभीर परम्परा से – बन गए हैं किसान।
एक दु:ख दर्द, एक खुशी, कमोबेश एक सा जीवन .. लेकिन 
3,13 की माला जपते हैं पंडित मार्तण्ड शुक्ल ‘शास्त्री’ ; सूर्य और चन्द्र से नाता जोड़ते हैं ठाकुर जनार्दन सिंह; कृष्ण भगवान के डी एन ए खोजते रहते हैं कन्हैया सिंह यादव और वृषल चन्द्रगुप्त की जन्मपत्री लिए घूमते हैं ज्वाला प्रताप मौर्य…
धन्य भारत भू ! जय हो !!

… बंगाली लोग कहते हैं मछली खाने से दिमाग तेज होता है। उपर की बातें बड़के भैया के निमंत्रण पर उत्तर प्रदेश मीन महोत्सव में खाई गई मछली से उपजी दिमागी तेजी से आई हैं। हमार कउनो कसूर नाहीं । … हम तो बंगाली दादाओं की बात के कायल हो गए हैं लेकिन दाल में सुम्हा मछली पका कर तो नहिंए खा पाएँगे। 
कल डा. अरविन्द मिश्र जी के निमंत्रण पर मोतीमहल लॉन, लखनऊ में आयोजित मीन महोत्सव में मैं सपरिवार गया था। भव्यता, विविधता और व्यवसायिकता देख कर हम लोग दंग रह गए। माया मैम की लाठी का असर हो या साल में एक बार ही सही, जग जाने की परम्परा का पालन हो, लग गया कि राज्य सरकार के अधिकारियों में दम है। ये बात और है कि वहाँ से लौटने के बाद घटित दुर्घटना ने उन्हें गरियाने का मौका दे ही दिया और एक बार फिर मैं अपने पूर्वग्रह के किले में बन्द हो गया – ये सब बस वैसे ही हैं। 
- वैसे दम कुछ ही लोग लगाते हैं और बाकी ?
- बस ‘जोर लगा के हंइसो हंइसो’ कहते रहते हैं जब कि असल में अपने दम को स्वयं और आका के दमदमी टकसाल में सिक्के जमा करने के लिए बचा रखते हैं।
पूर्वांश की अनुभूति बड़के भैया को मंच संचालन करते देख कर हुई। उत्तरांश की अनुभूति उस समय हुई जब हम फिश फ्राई और कबाब भकोस रहे थे। (दाईं ओर के चित्र को देखिए, भैया भी खड़े हैं। न, न… शाकाहारी हैं – कुछ ऐसा वैसा न सोच लीजिएगा। मंच छोड़ कर बीच बीच में यह देखने आ रहे थे कि हम लोग ठीक से काँटा निकाल कर खा रहे हैं कि नहीं ? :)     
एक सज्जन टाई धारी ऑफिसर खुलेआम किसी ठीके की बावत दो लाख रुपयों की माँग एहसान जताते कर रहे थे।
मोबाइल पर दूसरी तरफ से क्या कहा जा रहा था, यह तो नहीं पता लेकिन जब उन्हों ने किसी मंत्री जी की बात कर आवाज धीमी की और पेंड़ के नीचे चले गए तो हलाल होते जाने कितनी जानों का खयाल कर मैं बाल्मीकि हो गया और उतर आया उत्तर अंश अनुष्टप।
.. तो आयोजन भव्य था। तरह तरह के स्टाल और शामियाने लगे थे। कृत्रिम लघु झरने, भाँति भाँति के अक़्वेरियम, मछलियों और झिंगों के संरक्षित शरीर, ग्लास, स्फटिक के बने हुए मत्स्य मॉडल, फिश फार्मिंग की जानकारी देते सरकारी और प्राइवेट स्टाल, मछली पालन के विविध आयामों की जानकारी देती हुई संगोष्ठी जिसमें इतर राज्यों से आए वैज्ञानिक भी थे और लखनऊ के आस पास से आए तमाम किसान, मछुआरे भी…पंडालों और तम्बुओं की भव्यता वी आइ पी विवाह सी छटा बिखेर रही थी।

दूर बैठे लोगों को वैज्ञानिकों द्वारा बताई जा रही काम की बातें दिखाई सुनाई दें, इसके लिए दो बड़े आकार के एल सी डी मॉनिटर तक लगे हुए थे मय ध्वनि विस्तारण यंत्र। राज्य सरकार की तरफ से लोगों को फिश फ्राई, फिश कबाब और अस्थिविहीन मत्स्य व्यंजनों का सुस्वादन कराने के लिए स्टाल भी लगा था जिसमें ताजा माल बनते हुए, देखते हुए आप रसास्वादन कर सकते थे।

ब्लड प्रेशर नापने और मधुमेह की घरेलू मॉनिटरिंग के लिए इलेक्ट्रॉनिक यन्त्र बेंचती फर्म थी तो यूरोपियन स्टाइल की बंशी का प्रदर्शन करते गँवई उद्यमी भी थे। ओझवा को बताना है कि हमरे उसके ऊ पी में यह सब मिलता है। हैट लगा कर केवल फोटो न खिंचवाए बल्कि बलिया की गंगा किनारे बैठ थोड़ी मछली भी मार लिया करे। बहुत हुईं ये गणित और इंवेस्टमेंट बैंकिंग की बातें !

.. खेतिहर लोग अब मछुआरे बन रहे हैं। एक और खामोश क्रांति ? बाभन, ठाकुर, अहिर, चमार …में मछुआपन भी जुड़ रहा है। .. मूँछ पर ताव देते ठाकुर साहब 5 किलो का रोहू उपजाए हैं। .. सामाजिक तनुता के बढ़ने की प्रक्रिया बहौत धीमी होती है।
IMG227-01
IMG226-01बड़ी बड़ी गोभियों को देख तो हम बौरा गए
मूली का साइज देख भन्ना भी गए !
हरे देसी टमाटर और आलुका के क्या कहने !





 
बड़के भैया के साथ हम सपरिवार – प्रदर्शनी पंडाल में।
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अब आप जरा नीचे के इन फोटुओं को भी देख लें।

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(1) मेरे सुपुत्र महोत्सव स्थल पर
(2) प्रदर्शनी में दिखाया गया दीवार पर लगाया जा सकने वाला एक झरना
(3) इस जाल को आप ने चँवर खेतों में लगा देखा होगा!
(4) झींगे ही झींगे
(5) बाप रे ! इतनी बड़ी मछली !
कठपुतली नृत्य का भी आयोजन था लेकिन उसे छोड़ हम लोग वापस आ गए। कुछ अतिथि आने वाले थे। सम्भवत: किसी ईश्वर ने मेरे लिए यह देखना तय कर रखा था कि गड्ढे में भैंस कैसे गिरती है और तब आपदा से निपटने को मज़दूरों की तरफ से कैसे नेतृत्व सामने आता है !  
IMG230-01मीन महोत्सव में प्रदर्शित बहुत सी वस्तुएँ हम गरीबों की जेब से बाहर थीं लेकिन एक छोटा फिश पॉट और चार छोटी गोल्ड फिश हमलोग खरीद लाए। कोई आवश्यक नहीं कि बड़ी खुशियों के लिए बड़े और महँगे आधार ही हों …छोटी छोटी खुशियों को सहेजती ज़िन्दगी गुनगुनी हो जाती है – आज की खिली धूप की तरह। IMG234-01
मछलियों को अक़्वेरियम के पानी से एकदम घर के पानी में नहीं डाला जाता। तापमान के अंतर से मिनटों में वे मर जाती हैं। विधि यह है कि घर का पानी फिश पॉट में भर कर मछलियों  को मय पुराने पानी और पॉलीथीन पॉट में रख दें। दो घंटों में धीरे धीरे जब दोनों ओर का तापमान समान हो जाता है तो मछलियाँ भी अनुकूल हो जाती हैं। फिर पॉलीथीन को निकाल कर उन्हें फिश पॉट में डाल दीजिए। देखिए कैसे तैर रही हैं !
 हाँ, हम फिश फ्राई खाते हैं और मछली पालते भी हैं – घर के सदस्य की तरह। दोनों में अंतर है।
.. सोच रहा हूँ कि मन के भावुक अक़्वेरियम से अपने को निकाल कर इस दुनिया की धार में छोड़ दूँ तो तापमान के अंतर से कहीं मेरा वह सब कुछ मर तो नहीं जाएगा जिसकी बदौलत मैं इतना खुश रहता हूँ ?

… गई भैंस गड्ढे में

नगरपालिका, जल संस्थान वगैरह के गड्ढों को मैं इस देश की छाती के नासूर मानता हूँ। ये गड्ढे भारत के प्रशासन को चलाते लोगों की सम्वेदनहीनता के मवाद सँजोते हैं और गन्धाते रहते हैं। ये गड्ढे आम नागरिक की सहिष्णुता और कष्टसह्य प्रकृति को उजागर करते हैं। हमारे उन्नत राष्ट्र होने की गाड़ी इन्हीं में फँसी पड़ी है।
ये हैं इसलिए हैं – बँगलों में चाँदी के तम्बू तले बाँसुरी बजाते कृष्ण कन्हैया; भयानक ठंड में पॉलीथीन के आशियाने में ठिठुरते मजदूर; राशन की लाइन में खाँसते बुजुर्ग; खेलने पढ़ने की उमर में घरों में काम करती लड़कियाँ;  चन्द रुपयो की नौकरी में शोषित होते हमारे जवान; आत्महत्या करते किसान ….. भारत की यह जैव विविधता इन गड्ढों की बदौलत अक्षुण्ण है।
वेतन की स्केल से कैसे भी न नापी जा सकने वाली समृद्धि की ऊँचाई इन गड्ढों की गहराई से अपनी उठान लेती है।
गड्ढे बताते हैं कि हम कितने भ्रष्ट हैं।
मेरा पड़ोसी गड्ढा मेरे तमाम प्रयासों जैसे नेट शिकायत, पत्र, रजिस्टर्ड पत्र, टेलीफोन, फॉलोअप के बावजूद पिछले आठ महीनों से वैसे ही है। इस देश में अगर व्यक्ति जागरूक है तो या तो वह आत्महत्या कर लेगा या हत्या कर देगा । और कोई रास्ता भी नहीं है। मैं इस कथन द्वारा अपनी जागरूकता को लगाम लगाता रहता हूँ। … All is well, All is well … लेकिन आज मेरी आशंका सचाई में बदल गई। उस बिना चैम्बर के खुले सीवर मैन होल में एक भैंस गिर गई। जिन मजदूरों को हम जागरूक लोग रस्टिक कहते हैं, उन लोगों ने बिना किसी अपील के स्वत: आ कर प्रयास कर भैंस को बाहर निकाला। नीचे चित्रों में देखिए । ऐसा उन लोगों ने इसलिए किया कि वे लोग ‘विशिष्ट श्रेणी के आम’ नागरिक हैं – पर दु:ख कातर। संतोष हुआ कि  पॉलीथीन के आशियाने में ठिठुरते बिहारी मजदूरों में संवेदना जीवित है।
30012010 30012010(001)
30012010(002) 30012010(003)
30012010(004) 30012010(006)
हिंसक प्रसन्नता भी हुई कि जो अहिर मेरे तमाम बार कहने पर भी अपनी भैंसों को खुले छोड़ मेरे पौधों का नाश करता रहा, उसे आज सबक मिला। नहीं, वह गरीब नहीं है – बाइस लाख की जमीन में भैंसियाना खोले हुए है बड़े साहब का जिनके बँगले में चाँदी के तम्बू तले बाँसुरी बजाते हैं कृष्ण कन्हैया। कन्हैया जी को भोग के लिए शुद्ध दूध दधि चाहिए।
हाथी के दाँत नहीं अब हजारो हाथियों के संगमरमरी बुतों की शक्ल में हजारो करोड़ पानी में बहाए जाते हैं लेकिन एक सीवर के मैनहोल को ढकने के लिए धन नहीं है।तंत्र नहीं है। जन नहीं हैं। सीवरों के मैनहोल ढक्कन कागजों में लग कर दीमकों द्वारा खाए जा चुके हैं। इन सीवरों का पानी कहीं नहीं जाता, इन धनपशुओं के भगवान को स्नान कराने के लिए प्रयुक्त होता है।   
.. क्या होता अगर उस गड्ढे में कोई मनु संतान गिर गई होती ! जो किसी की हँसती बिटिया होती, किसी का लाल होता !!
क्या इस समय मैं ऐसे पोस्ट लिख रहा होता ? थाने के चक्कर लगा रहा होता या हॉस्पिटल में पोस्टमॉर्टम की रिपोर्ट का इंतजार कर रहा होता। मुझमें कहीं अभी संवेदना जीवित है लेकिन उन हरामखोर मक्कारों का क्या करें जिनके मुर्दाघरों में मवाद पल रहा है  …

उदास द्विपदियाँ -26 जनवरी पर

जिस दिन खादी कलफ धुलती है।
सजती है लॉंड्री बेवजह खुलती है।

फुनगियों को यूँ तरस से न देखो,
उन पर चिड़िया चहक फुदकती है।

बहुत है गुमाँ तेरी यारी पर दोस्त,
सहमता हूँ जो तुम्हारी नज़र झुकती है।

ये अक्षर हैं जिनमें सफाई नहीं
आँखों में किरकिर नज़र फुँकती है।

गाहे बगाहे जो हम गला फाड़ते हैं,
चीखों से साँकल चटक खुलती है।

रसूख के पहिए जालिम जोर जानी,
जब चलती है गाड़ी डगर खुदती है।

आईन है बुलन्द और छाई है मन्दी,
महफिल-ए-वाहवाही ग़जब सजती है।

पथराई जहीनी हर हर्फ खूब जाँचे,
ग़ुमशुदा तलाश हर कदम रुकती है।

खूब बाँधी हाकिम ने आँखों पे पट्टी,
बाँच लेते हैं अर्जी कलम रुकती है।

तुम्हारी कविताई

पारदर्शी पात्र
सान्द्र घोल।
तुमने डाल दी 
एक स्याही की टिकिया
धीरे से।
रंग की उठान
धीरे धीरे 
ले रही आकार।

जैसे समिधा 
निर्धूम प्रज्वलित,
समय विलम्बित
बँट गया फ्रेम दर फ्रेम।
..कि 
आखिरी आहुति सी
खुल गई
अभिव्यक्ति एकदम से !

तुम्हारी कविता
बना गई मुझे द्रष्टा
एक ऋचा की।

पुरानी डायरी से -11 : … मैं बूढ़ा हो गया …

22 मई 1992, समय:__________                                                          …. मैं बूढ़ा हो गया …

सुबह सुबह आज 
दाढ़ी बना रहा था।
थोड़ा सा एकांत देख
बीवी ने कहा
सुनते हो, बिटिया सयानी हो गई है
कहीं बातचीत तो करो ! 


उसी पल 
शीशे में कनपटी के बाल सफेद हो गए।
चेहरे की झुर्रियाँ उभर कर चिढ़ाने लगी मुँह । 
आँखें धुँधली हो गईं।
उसी पल
मैं बूढ़ा हो गया।
… मेरे भीतर कुछ टूट गया।