वन्दे मातरम्
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“This flag is of Indian Independence! Behold, it is born! It has been made sacred by the blood of young Indians who sacrificed their lives. I call upon you, gentlemen to rise and salute this flag of Indian Independence. In the name of this flag, I appeal to lovers of freedom all over the world to support this flag.”
– B. Cama , Stuttgart, Germany, 1907
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“…द टाइम हैज कम”
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विवाह के चौदह वर्ष – काकबन्ध्या की कोख से दो पुत्र उपजे लेकिन मृत्यु का वात्सल्य उसके वात्सल्य पर भारी पड़ा था। अशिक्षा, संयुक्त परिवार, सड़ी मान्यताएँ और रीतियों ने जननी के दो पुत्रों की हत्या कर दी थी। ज्योतिषी ने हर बार कहा काकबन्ध्या की संतति को यम नहीं छोड़ता। सात दिनों के भीतर ही ! ..
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दाई आ गई। सुश्रुषा शुरू हुई – तीसरे पुत्र का जन्म हुआ।…
… सब कुछ ठीक ही हुआ था…अचानक शरीर ने महीनों की यातना का दूषण निकालना शुरू किया . . . मास्टरनी की हालत बिगड़ती गई। धाय सो गई थी, बाद में पता चला कि संतानहीना थी। काकबन्ध्या! तुम्हें धाय भी कैसी मिली!…ठंढ के कारण नवजात छींकने लगा। सद्य:जन्म लिया शिशु छींक सकता है? …
.. नहीं, इस बार नहीं ! साहस संजो प्रसूति कक्ष से माँ ने कराहती आवाज दी, अपने पुत्र को संभालिए। मेरी स्थिति ठीक नहीं है। परम्परा से निषिद्ध स्थान में मास्टर ने प्रवेश किया और रजाई में शिशु को लपेट केवल नाक को उघार गोद में ले कर बैठ गया। थोड़ी देर में शिशु सो गया, अति लघु खर्राटे। नवजात खर्राटे ले सकता है ! निहाल मास्टर रात भर अपने पुत्र का चेहरा निहारता रहा। ..
दूषित रक्त के साथ ही मन से बाहर बह गईं थीं – लांछनाएँ, आरोप, अत्याचार और शोषण से उद्भूत शापित भावनाएं। दुखिया त्रास से मुक्त हो सो गई। सुहाग के साए तले काकबन्ध्या अब वात्सल्य तृप्त सोहागिन पुत्रवती नारी थी। इस छाँव में यम की कोई आशंका नहीं थी।…
शिष्य से सन्देशा पा सुबह नाना नानी पूरी बैलगाड़ी सामान भर आ पहुँचे-हाय हाय करते, एक दिन पहले ही तो नानी को आवश्यक काम से जाना पड़ा था ! वह सुबह छठ की थी। नानी ने नाम दिया – छठ्ठू। … जीवन उन्मुक्त ठाठ से प्रवाहित हो चला।
कहते हैं दक्षिण दिशा यम की दिशा है। लेकिन आगे भी जाने कितनी घटित घटनाओं द्वारा वह क्वार्टर इस धारणा को झुठलाता रहा…..
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आज गिरिजेश का जन्मदिन है।
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वे तीन जन जिन्हों ने भुगता और साक्षी हुए (दाई का फोटो कहाँ से लाऊँ?) . / बहुत बाद के फोटोग्रॉफ/ |
…होनी चाहिए
तुम आओ, न आओ घर हमारे – हम तो हर पल अगोरेंगे
बची तुम्हारे जेहन में, हमारी यादों की सौगात होनी चाहिए।
न आई तुम, पूछा किए भोर से, उषा से, चमकते आफताब से
शाम रुसवा हुई, खत से जाना कि मिलन की रात होनी चाहिए।
धौकनी बन गई साँसें, आँच निकले है जैसे गरम रोटी से
बुझा चूल्हा, कहीं किनारे अँसुअन भरी परात होनी चाहिए।
बाहर मची है अन्धेरगर्दी, न कोसो आइने से मुखातिब हो
पहले गली में, नुक्कड़ पर, निकलने की औकात होनी चाहिए।
देखा है सुना है, मचल जाते हैं तुम्हारे असआर बाहर आने को
हवा में उछालने से पहले, जुमले की मालूमात होनी चाहिए।
वजह जगह भले अलहदा, सड़क पर हो राशन की लाइन में हो
कहीं भी कैसे भी हो, जरूरी है मेरे दोस्त, बात होनी चाहिए।
बड़ी होती स्कॉलर बेटी
गला काटू प्रतिस्पर्धा के जमाने में प्रतिभाएँ संकुचित न हों, दूसरे प्रोत्साहित हों और ध्यान केवल सकल प्रतिशत मार्क्स पर आधारित पहले तीन स्थानों पर ही न हो -यह आयोजन इन सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करता दिखा। अच्छा लगा। अच्छी बात यह लगी कि ग्रेडिंग सिस्टम लागू हो जाने पर भी यह व्यवस्था जारी रह सकती है।
कार्यक्रम के पहले जो प्रार्थना बच्चों ने गाई, उसके कुछ अंश इस प्रकार हैं:
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हम को मन की शक्ति देना ,मन विजय करें दूसरो की जय से पहले, ख़ुद को जय करें.. झूठ से बचे रहें, सच का दम भरें.. ख़ुद पर हौसला रहें बदी से न डरें.
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क्या सफल होने के लिए अच्छी और बुरी बातों का प्रयोग, समन्वय और संतुलन आवश्यक नहीं है?
हम उन्हें समय पड़ने पर बदी से डरने, झूठ बोलने, कायरता और कमजोरी दिखाने जैसी निवेदन वाली प्रार्थनाएँ क्यों नहीं सिखाते? तब जब कि वास्तविक जीवन में हम हमेशा यही होता देखते हैं। दुनिया चलती रहती है, झूठ बोलने या बदी से डरने या कायरता दिखाने से कहीं कोई प्रलय भी नहीं आता। समाज गतिशील बना रहता है। फिर ये और ऐसी प्रार्थनाएँ क्यों?
एक दूसरे समवेत गायन की ये पंक्तियाँ चौंका गईं:
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राम और मुहम्मद की धरती
किसी से भेदभाव नहीं करती।
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जैसा कि होता है शिक्षा अधिकारी और प्रधानाचार्या जी आधे घण्टे विलम्ब से आईं – तब जब कि दोनों कार्यालय में ही विराजमान थीं। अभिभावक तो समय से आ ही गए थे – कुछेक विशिष्टों को छोड़ कर। अच्छा लगा कि इस एक हरकत से उन्हों ने बच्चों को जीवन की एक महत्त्वपूर्ण सीख दे दी – यदि समय वग़ैरह की पाबन्दी न माननी हो और फिर भी जलवे बनाए रखने हों तो विशिष्ट बनो। फिर अशिष्टता, झूठ वगैरह मायने नहीं रखते। उनके लिए प्रार्थनाएँ तो वाकई बेमानी हो जाती हैं।
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अड़बड़िया कड़बड़
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गहन चलो
काला पहन चलो मन चलो उजले कफन चलो। |
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धंसती है लीक बहके कदम चलो रस्ते पे वे पटरी सहम चलो हँसते हैं गाल आँखों बहम चलो। |
ऊँची उनकी नाक
रस्ते नमन चलो
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दूरी है क्या
पाथे बिखर चलो
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गोल गोल दिखते
नज़रें उठन चलो
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शरम का बहम
दिखता अहम चलो काला पहन चलो मनचलों ! |
पुरानी डायरी से – 5 : धूप बहुत तेज है।
‘धूप बहुत तेज है’
इस लाल लपलपाती दुपहरी में
काले करियाए तारकोल की नुकीली
धाँय धाँय करती सड़कों पर
नंगे पाँव मत निकला करो
क्यों कि
धूप बहुत तेज है।
लहू के पसीने से नहा कर
तेरी शरीर जल जाएगी इन सड़कों पर ।
लद गए वो दिन
जब इन सड़कों की चिकनाई
देती थी प्यार की गरमाई।
बादलों की छाँव से
सूरज बहुत दूर था।
मस्त पुरवाई के गुदाज हाथ
सहला देते थे तेरे बदन को ।
आज सब कुछ लापता है
क्यों कि
धूप बहुत तेज है।
सुबह के दहकते उजाले में
तीखी तड़तड़ाती आँधी (मुझे याद आ रहा है कि ये पंक्तियाँ किसी दूसरे की कविता से ली गई थीं)
भर देती है आँखों में मिर्च सी जलन।
छटपटाता आदमी जूझता है अपने आप से।
काट खाने को दौड़ता है अपने ही जैसे आदमी को।
नहीं जानता है वह
या जानते हुए झुठलाता है
कि
सारा दोष इस कातिल धूप का है।
निकल पड़ो तुम
इस धूप के घेरे से।
क्यों कि यह धूप !
नादानी है
नासमझी है।
क्यों कि
तेरे मन के उफनते हहरते सागर के लिए
यह धूप बहुत तेज है।
धूप बहुत तेज है।
इलाहाबाद से ‘इ’ गायब – अंतिम भाग
अंग्रेजी के e का कमाल तो देख लिया – धड़ाधड़ लाइव सी रिपोर्टिंग में लेकिन हिन्दी की छोटी ‘इ’ का कमाल देखना बाकी है। उस मात्रा का कमाल देखना बाकी है जिसने e कोड वालों को बहुत दु:ख दिए, इतनी विनम्र कि पहले लगती है, फिर उच्चरित होती है- मतलब कि काम पहले बात बाद में। …
इलाहाबाद से ‘इ’ गायब, भाग -1
प्रयाग ब्लॉगर संगोष्ठी (जी हाँ ब्लॉगरी में इलाहाबाद को प्रयाग कहने वालों के लिए भी जगह है।) के बारे में सोचा था कि नहीं लिखूँगा लेकिन बहुत बार अपना सोचा नहीं होता।
एक तरफ से ऑबजेक्शन उठा। उन्हें बी.ए. प्रथम वर्ष में पढ़ाते रामचन्द्र शुक्ल याद आ गए थे। बड़ा ऑबजेक्सन था उन्हें? (ब्लॉगरी में क्या सचमुच रामचन्द्र शुक्ल का स्थान नहीं? अरुन्धती रॉय के बारे में क्या ख्याल है?) ये वही थीं जो पहले भी और बाद में भी तमाम असम्बद्ध सी अनर्गल बातें धड़ल्ले से कहती रहीं और पब्लिक सुनती रही थी। हिमांशु जी ने विषय की प्रकृति को बताते हुए उन्हें समझाया लेकिन उन्हें समझ में शायद ही आया हो। भोला चन्दौलीवासी अभी भी समझ नहीं पाया। उसके उपरांत फिर मेरी ही एक अत्यंत ही दूसरे मिजाज की कविता की बात उठाई ही थी कि बगल से आवाज आई ,”आप कहना क्या चाहते हैं?” जो कथ्य को विषय से जोड़ सुनने की कोशिश भी नहीं कर रहे थे उन्हें कथ्य के बारे में तफसील चाहिए थी। [अरे हिमांशु भैया! मुझे बाद में लगा कि एक ही कवि (गुस्ताखी कर रहा हूँ, ब्लॉगर कहना अधिक उपयुक्त होता। नहीं?) की दो आम जीवन से जुड़ी और एकदम विपरीत भावभूमियों की कविताओं द्वारा आप यह दर्शाना चाहते थे कि ब्लॉगरी की कविता की भावभूमि कितनी विविध है और ब्लॉगर कवि कितने विविध तरीकों से अपनी बात कहते हैं. . .लेकिन देखनहार देखना चाहें तब न !]




