वर्ड प्रेस पर आलसी

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तन धन …अकिञ्चन

यौवन
तन धन
सजे
सन सन।


शोर शोख 
बरजोर बार,
बार लेकिन 
कानों में कन कन 
तन धन
बजे घन घन।


आँख डोर 
बहकन
मन पतंग
तड़पन।
उठन शहर भर 
नीक लगत 
हवा पर
विचरण 
लहकन
तन धन 
बिखर छम थम।


लुनाई -
साँवरा बदन
कपोल लाल 
अधपके जामुन 
रस टपकन 
अधर मधुर 
मधु भर भर
कान लोर
लाल 
शरम रम रम 
तन धन
सिमट 
कहर बन शबनम।  


देह 
द्वै कुम्भ काम
दृग विचरें 
सप्तधाम 
कटि कुलीन 
नितम्ब पीन 
उतरे क्षीण
जैसे  
पश्चात मिलन 
पतली पीर 
सिमटन
तन धन 


धत्त अकिंचन !

November 26, 2009 Posted by गिरिजेश राव | तन, धन, सौन्दर्य कविता | | 14 Comments

नरक के रस्ते – 5

निवेदन और नरक के रस्ते – 1
नरक के रस्ते – 2 

नरक के रस्ते – 3 
नरक के रस्ते – 4      से जारी….




एक फसल इतनी मजबूत !
जीने के सारे विकल्पों के सीनों पर सवार
एक साथ ।
किसान विकल्पहीन ही होता है
क्या हो जब फसल का विकल्प भी
दगा दे जाय ?
गन्ना पहलवान
– बिटिया का बियाह गवना
– बबुआ का अंगरखा          
- पूस की रजाई
- अम्मा की मोतियाबिन्द की दवाई
- गठिया और बिवाई
- रेहन का बेहन
- मेले की मिठाई
- कमर दर्द की सेंकाई
- कर्जे की भराई  ….
गन्ना पहलवान भारी जिम्मेदारी निबाहते हैं।
सैकड़ो कोस के दायरे में उनकी धाक है
चन्नुल भी किसान
मालिक भी किसान
गन्ना पहलवान किसानों के किसान
खादी के दलाल।
प्रश्न: उनका मालिक कौन ?
उत्तर: खूँटी पर टँगी खाकी वर्दी
ब्याख्या: फेर देती है चेहरों पर जर्दी
सर्दी के बाद की सर्दी
जब जब गिनती है नोट वर्दी
खाकी हो या खादी ।
चन्नुल के देस में वर्दी और नोट का राज है
ग़जब बेहूदा समाज है
उतना ही बेहूदा मेरे मगज का मिजाज है
भगवान बड़ा कारसाज है
(अब ये कहने की क्या जरूरत थी? )….
आजादी –  जनवरी है या अगस्त?
अम्माँ कौन महीना ?
बेटा माघ – माघ के लइका बाघ ।
बबुआ कौन महीना ?
बेटा सावन – सावन हे पावन ।
जनवरी है या अगस्त?
माघ है या सावन ?
क्या फर्क पड़ता है
जो जनवरी माघ की शीत न काट पाई
जो संतति मजबूत न होने पाई  
क्या फर्क पड़ता है
जो अगस्त सावन की फुहार सा सुखदाई न हुआ
अगस्त में कोई तो मस्त है
वर्दी मस्त है – जय हिन्द।
जनवरी या अगस्त?
प्रलाप बन्द करो
कमाण्ड !  - थम्म
नाखूनों से दाने खँरोचना बन्द
थम गया ..
पूरी चादर खून से भीग गई है…
हवा में तैरते हरे हरे डालर नोट
इकोनॉमी ओपन है
डालर से यूरिया आएगा
यूरिये से गन्ना बढ़ेगा।
गन्ने से रूपया आएगा
रुक ! बेवकूफ ।
समस्या है
डालर निवेश किया
रिटर्न रूपया आएगा ।
बन्द करो बकवास – थम्म।
जनवरी या अगस्त?
  
ये लाल किले की प्राचीर पर
कौन चढ़ गया है ?
सफेद सफेद झक्क खादी।
लाल लाल डॉलर नोट
लाल किला सुन्दर बना है
कितने डॉलर में बना होगा ..
खामोश
देख सामने
कितने सुन्दर बच्चे !
बाप की कार के कंटेसियाए बच्चे
साफ सुथरी बस से सफाए बच्चे
रंग बिरंगी वर्दी में अजदियाए बच्चे
प्राचीर से गूँजता है:
मर्यादित गम्भीर
सॉफिस्टिकेटेड खदियाया स्वर
ग़जब गरिमा !
”बोलें मेरे साथ जय हिन्द !”
”जय हिन्द!”
समवेत सफेद खादी प्रत्युत्तर
“जय हिन्द!“
”इस कोने से आवाज धीमी आई
एक बार फिर बोलिए – जय हिन्द”
जय हिन्द , जय हिन्द, जय हिन्द
हिन्द, हिन्द, हिन् …द, हिन् ..
..हिन हिन भिन भिन
मक्खियों को उड़ाते
नाक से पोंटा चुआते
भेभन पोते चन्नुल के चार बच्चे
बीमार – सुखण्डी से।
कल एक मर गया।
अशोक की लाट से
शेर दरक रहे हैं
दरार पड़ रही है उनमें ।
दिल्ली के चिड़ियाघर में
जींस और खादी पहने
एक लड़की
अपने ब्वायफ्रेंड को बता रही है,
”शेर इंडेंजर्ड स्पीशीज हैं
यू सिली” । (जारी..) 

November 23, 2009 Posted by गिरिजेश राव | कुम्भीपाक, खादी, गन्ना, जय हिन्द, नरक | | 14 Comments

पुरानी रामायण – 1

1 आदिकवि महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण का यह संस्करण गीताप्रेस, गोरखपुर द्वारा संवत 2017 (सन 1960) में छापा गया। प्रतियाँ थीं 10000। आठ वर्षों के पश्चात 15000 प्रतियाँ छपीं, जब पिताजी उनमें से एक घर ले आए। दो भाग थे – मूल्य दोनों का मात्र बीस रूपए। उस जमाने के हिसाब से सस्ता नहीं कहा जा सकता लेकिन गुणवत्ता के क्या कहने ! गेरुए रंग की कपड़े की मजबूत जिल्द (आज तक नहीं फटी है), त्रुटिहीन, स्वच्छ छपाई और सौन्दर्य का खयाल। प्रति वर्ष 1250 प्रतियाँ बिकीं तो कहीं धार्मिक भावना से अधिक प्रोडक्सन क़्वालिटी का योगदान ही रहा होगा।
श्वेत श्याम और रंगीन चित्र इतने नयनाभिराम थे कि आँखें बरबस ठहर सी  जाती थीं/हैं। जैसा कि पिताजी द्वारा पाठन के विराम को ओंकार चर्चित दिनांक से अंकित  hastaaxarकरने से स्पष्ट है, सन 1971 में भी वह इसे पढ़ रहे थे।  हमलोग इसके दो भागों के नयनाभिराम चित्रों को देखते हुए बड़े हुए और अनजाने ही संस्कारित होते चले गए। राम के अनेक रूप, सीता की सहज सुन्दरता, वीर बजरंगी के वज्र शरीर से फूटती ऊर्जा …..  सब सम्मोहित कर देते थे। बड़े होते जब पढ़ने लगा तो समझ बढ़ते बढ़ते बहुत कुछ नोटिस किया जो इस लेख के दूसरे भाग में बताऊँगा – अभी तो चित्रों पर ही केन्द्रित रहूँगा।  ये चित्र विशुद्ध भारतीय शैली में विशुद्ध भारतीय सौन्दर्य दृष्टि से पात्रों को दर्शाते हैं – इसीलिए मन को मोहते हैं। मुख्य पात्रों के अलावा बैकग्राउण्ड के विन्यास और अंकन में अनुपात की त्रुटियाँ हो सकती हैं लेकिन सम्प्रेषण की सटीकता इतनी बोल्ड है कि उसके आगे सब कुछ छिप जाता है।

(1) जरा मंत्रणा करते सुग्रीव, वानर समाज और राम लक्ष्मण को देखिए! बैकग्राउण्ड के दो शिखर दोनों भाइयों के कोमल आनुपातिक शरीरों को पौरुष की गरिमा दे रहे हैं। डीटेलिंग न्यून रखते हुए चित्रकार कैसे वानर वीरों के शरीर सौष्ठव को उभार रहा है !!
(2) समुद्र लाँघते हनुमान की विराटता देखिए! समुद्र की लहरों में रेखाओं के घुमाव, चाप और अपूर्णवृत्तवत वक्र रेखाएँ भारत की सनातन कलाकारी को दर्शाती हैं। इस कलाकारी ने एक तरफ तो अनगढ़ ब्राह्मी लिपि को सुन्दर आकार दिए तो दूसरी तरफ खजुराहो की मूर्तियाँ भी दीं।
(3),(4),(5) सीता के सौन्दर्य को निरखिए – मूर्तिमान पवित्रता ! उत्तर भारतीय नारी का गरिमामय सौन्दर्य और सखी सरमा अपने सारे रक्ष सौन्दर्य के साथ कितनी आत्मीय है!!
(6) अशोकवाटिका का विध्वंश करते मारुति का पौरुष, उल्लास और कौतुक निरखिए! पेंड़, भागते राक्षस और मन्दिर सभी कितने लघु हो गए हैं!!
(7) रावण की सभा में राक्षसों का चित्रांकन तो अति उत्तम है लेकिन भव्यता सादगी के आगे पराजित हो गई है। पर्सपेक्टिव का दोष है क्या?
(8) सीता को ढूढ़ कर लौटते वानर समूह, भ्राताद्वय और सुग्रीव का चित्रांकन अद्भुत है। घने छाए बादलों के बीच से प्रकट होता वानर समूह राम, लक्ष्मण और सुग्रीव की मन:स्थिति से एकदम से जुड़ रहा है। पात्रों के चित्रांकन के तो क्या कहने !
(9)  समुद्र को शासित करते राम का यह रूप ! सोचता हूँ कि फिर कोई चित्रकार बना पाएगा!! समुद्र की लहरों की उठान श्रीराम के क्रोध से कैसे मिल सी जा रही है और उनके मध्य दीन सा समुद्र। मैं अभिभूत रह जाता हूँ।
(10) राम से मिलने आते विभीषण के इस चित्र में वानर समूह की मुद्राओं का सौन्दर्य कितना स्वाभाविक लगता है !
(11)  कुम्भकर्ण को जगाने का यह दृश्य बहुत कमजोर प्रस्तुति है। भैंसे, राक्षस, हाथी वगैरह सब एक ही आकार के ! चित्रकार महोदय चूक गए !
(12)  कुम्भकर्ण वध के इस दृश्य में राम और हनुमान के लाघव और गति का चित्रण दर्शनीय है।
(13)  संजीवनी लाते हनुमान के इस चित्र में हताशा, आशा और कौतुहल एक साथ दिखते हैं।
(14) गरुड़, राम और लक्ष्मण का सजीव चित्रण !
(15) मेघनाद वध के इस दृश्य में लक्ष्मण और हनुमान की क्षिप्रता और लाघव को निरखिए।
(16) इन्द्र सारथी मातलि और श्रीराम के इस रंगीन चित्र में सब कुछ साधारण है।
(17) हनुमान के कन्धे पर बैठ रावण से युद्ध करते राम के इस चित्र में  रावण सारे ऐश्वर्य के बावजूद कितना हास्यास्पद लगता है! राम और हनुमान तो वीरता साक्षात हैं। इस चित्र में भी लैण्डस्केप की न्यूनता और कैनवास का संकुचन इसे साधारण कोटि का बना देता है।
(18)  रावण वध के इस दृश्य में बस राम और रावण को देखिए और देखते रह जाइए। कितनी उदारता से चित्रण हुआ है!
(19)  विजय के पश्चात विभीषण को वानरों का सत्कार करने का निर्देश देते राम यहाँ चित्रित हुए हैं। यह चित्र मुझे कमजोर लगता है।
(20) लक्ष्मण द्वारा विभीषण के राज्याभिषेक का यह चित्र अवसरोचित गरिमा का वातावरण लिए हुए है। एकबार फिर वैष्णवी सादगी के मोह के कारण कैनवास लघु हो गया है और भव्यता की उपेक्षा हुई है।
(21)  ऋषियों द्वारा श्रीराम के अभिनन्दन के इस दृश्य में वैष्णवी गरिमा अपने शिखर पर है।

                                                                                                
1_Shriram_sugreev
2_hanuman_sagar_langhan
3_seeta_sarma
4_sita_hanuman
5_hanuman_sita_conversation 6_hanuman_ashokvatika
7_ravan_sabha_hanuman 8_vanar_returning 9_Ram_samudra
10_vibheeshan_in_ramcamp 11_kumbhakarna 12_kumbhakarna_vadh
13_hanuman_with_booti 14_Shriram_Laxman_Garud 15_meghnad_vadh
16_Ram_Matali 17_ram_ravan_hanuman_yuddha 18_ravan_vadh
19_ram_vibheeshan_pushpak 20_Vibheeshan_rajyabhishek 21_ram_with_saints
चित्रों को बड़ा कर देखने के लिए उन पर क्लिक करें।
सारे चित्र चित्रकार जगन्नाथ ने बनाए हैं। गीताप्रेस द्वारा प्रकाशित वाल्मीकि रामायण की आजकल की प्रतियों में ये चित्र नहीं मिलते। सोचा कि इन्हें भविष्य के लिए सहेज दूँ और आप सब का इनसे परिचय कराता चलूँ। गीताप्रेस, गोरखपुर का इन चित्रों के लिए मैं आभारी हूँ। बिना अनुमति लिए पोस्ट करने की धृष्ठता कर रहा हूँ इसके लिए गीताप्रेस से क्षमाप्रार्थी हूँ। अपनी शुभेच्छा पर भरोसा है। कोई व्यवसायिक उद्देश्य तो है ही नहीं। (दूसरे भाग में जारी)

चलते चलते :
22 अक्टूबर 2009 को प्रयोग करते भूलवश यह लेख अधूरा ही प्रकाशित हो गया था। अग्रिम क्षमा की सावधानी के बावजूद यह 
पोस्ट तीन बहुत ही महत्त्वपूर्ण ब्लॉगरों की टिप्पणियाँ सहेज लाई।
उसके बाद मैंने टिप्पणी का विकल्प हटा दिया था। चूँकि उस पोस्ट को आज हटा रहा हूँ इसलिए उन टिप्पणियों  को यहाँ मान दे रहा हूँ:  
 हिमांशु । Himanshu ने कहा… प्रयोग आप कर रहे हैं, धैर्य आप रखें । टिप्पणीकार तो टिप्पणी कर ही जायेगा । October 22, 2009 2:10 PM 
 संगीता पुरी ने कहा… हिमांशु जी ने सही कहा .. धैर्य तो आपको रखना था .. आपने आधा अधूरा प्रकाशित क्‍यूं किया ? October 22, 2009 2:32 PM 
 Arvind Mishra ने कहा… अधूराकाम अनुचित है -हमारे धैर्य की परीक्षा मत लें ! October 22, 2009 2:42 PM 

November 21, 2009 Posted by गिरिजेश राव | गीताप्रेस, गोरखपुर, राम, रामायण, वाल्मीकि, श्रीराम | | 27 Comments

पाठक मेरे !

पाठक मेरे!
हाँ मैंने पढ़ी है तुम्हारी हर टिप्पणी
अक्षर, अक्षर , मात्रा , मात्रा
मैंने उनमें लय ढूढ़ने के जतन किए हैं
अपने लिए सम्मान प्यार तिरस्कार सब ढूढ़ा है
पाया है। 
वह बेचैनी भी ढूढ़ी है - 
काश ! थोड़ा ऐसे लिख दिया होता  
क्या बात होती ! 
कम्बख्त ने कबाड़ा कर दिया।
मैंने पाया है कई बार
स्तब्ध मौन – जब तुम बिना कुछ कहे चले गए।
वह स्पष्ट निन्दा बघार 
मेरे स्वर व्यंजन – व्यंजन स्वाद।
सब सवादा है।…. 
पाठक मेरे !
मैं मानता हूँ 
तुम भी पढ़ते होगे मुझे इसी तरह। 

November 19, 2009 Posted by गिरिजेश राव | टिप्पणी, पाठक | | 31 Comments

नरक के रस्ते – 4

निवेदन और नरक के रस्ते – 1
नरक के रस्ते – 2

नरक के रस्ते – 3      से जारी..

शिक्षा भयभीत करती है
जो जितना ही शिक्षित है
उतना ही भयग्रस्त है।
उतने ही बन्धन में है ।
गीता गायन पर मुझे हँसी आती है
मन करता है गाऊँ - 
होली के फूहड़ अश्लील कबीरे।
मुझे उनमें मुक्ति सुनाई पड़ती है।
बाइ द वे
शिक्षा की परिभाषा क्या है ?
शिक्षा , भय सब पेंसिल की नोक
जैसे चुभो रहे हों
मुझे याद आता है – सूरदास आचार्य जी का दण्ड
मेरी दो अंगुलियों के बीच पेंसिल दबा कर घुमाना!
वह पीड़ा सहते थे मैं और मेरे साथी
आचार्य जी हमें शिक्षित जो बना रहे थे !
हमें कायर, सम्मानभीरु और सनातन भयग्रस्त बना रहे थे
हम अच्छे बच्चे पढ़ रहे थे
घर वालों, बाप और समाज से तब भी भयग्रस्त थे
वह क्या था जो हमारे बचपन को निचोड़ कर
हमसे अलग कर रहा था?
जो हमें सुखा रहा था ..
नरक ही साक्षात था जो गुजरने को हमें तैयार कर रहा था।
आज जो इस नरक के रस्ते चल रहा हूँ
सूरदास की शिक्षा मेरी पथप्रदर्शक बन गई है…
अप्प दीपो भव  .. ठेंगे से  
अन्धे बुद्धों! तुम मानवता के गुनहगार हो
तुम्हारे टेंटुए क्यों नहीं दबाए जाते?
तुम पूजे क्यों जाते हो?…
..यहाँ सब कुछ ठहर गया है
कितना व्यवस्थित और कितना कम !
गन्ना मिलों के भोंपू ही जिन्दगी में
सिहरन पैदा करते हैं,
नहीं मैं गलत कह रहा हूँ –
ये भोंपू हैं इसलिए जिन्दगी है। ..
ये भोंपू बहुत सी बातों के अलावा
तय करते हैं कि कब घरनी गृहपति से
परोसी थाली के बदले
गालियाँ और मार खाएगी।
कब कोई हरामी मर्द
माहवारी के दाग लिए
सुखाए जा रहे कपड़ों को देख
यह तय करेगा कि कल
एक लड़की को औरत बनाना है
और वह इसके लिए भोंपू की आवाज से
साइत तय करेगा
कल का भोंपू उसके लिए दिव्य आनन्द ले आएगा।
… और शुरुआत होगी एक नई जिन्दगी की
जर्रा जर्रा प्रकाशित मौत की !!
वह हँसती हुई फुलझड़ियाँ
अक्कुड़, दुक्कुड़
दही चटाकन बर फूले बरैला फूले
सावन में करैला फूले गाती लड़कियाँ
गुड़ियों के ब्याह को बापू के कन्धे झूलती लड़कियाँ
अचानक ही एक दिन औरत कटेगरी की हो जाती हैं
जिनकी छाया भी शापित
और जिन्दगी जैसे जाँघ फैलाए दहकता नरक !  
..कभी एक औरत सोचेगी
माँ का बताया
वही डोली बनाम अर्थी वाला आदर्श वाक्य!
क्या उस समय कभी वह इस भोंपू की पुकार सुनेगी

भोंपू जो नर हार्मोन का स्रावक भी है ! ..

चित्त फरिया रहा है
मितली और फिर वमन !
…  चलो कमरे से जलते मांस की बू तो टली ।

कमरे में धूप की पगडण्डी बन गई है
हवा में तैरते सूक्ष्म धूल कण
आँख मिचौली खेल रहे
अचानक सभी इकठ्ठे हो भागते हैं
छत की ओर !
रुको !!
छत टूट जाएगी
मेरे सिर पर गिर जाएगी
..अचानक छत में हो गया है
एक बड़ा सा छेद
आह ! ठण्डी हवा का झोंका
घुसा भीतर पौने दस का भोंपा !
मैं करवट बदलता हूँ
सो गया हूँ शायद..
चन्नुल जगा हुआ है।
तैयार है।
निकल पड़ता है टाउन की ओर
जाने कितने रुपए बचाने को
तीन किलोमीटर जाने को
पैदल।
खेतों के सारे चकरोड
टोली की पगडण्डियाँ
कमरे की धूप डण्डी
रिक्शे और मनचलों के पैरों तले रौंदा जाता खड़ंजा
ये सब दिल्ली के राजपथ से जुड़ते हैं।
राजपथ जहाँ राजपाठ वाले महलों में बसते हैं।
ये रास्ते सबको राजपथ की ओर चलाते हैं
इन पर चलते इंसान बसाते हैं
(देवगण गन्धाते हैं।)
कहीं भी कोई दीवार नहीं
कोई द्वार नहीं
राजपथ सबके लिए खुला है
लेकिन
बहुत बड़ा घपला है
पगडण्डी के किनारे झोंपड़ी भी है
और राजपथ के किनारे बंगला भी
झोंपड़ी में चेंचरा ही सही – लगा है।
बंगले में लोहे का गेट और खिड़कियाँ लगी हैं
ये सब दीवारों की रखवाली करती हैं
इनमें जनता और विधाता रहते हैं ।
कमाल है कि बाहर आकर भी
इन्हें दीवारें याद रहती हैं
न चन्नुल कभी राजपथ पर फटक पाता है
न देवगण पगडण्डी पर।
बँटवारा सुव्यवस्थित है
सभी रास्ते यथावत
चन्नुल यथावत
सिक्रेटरी मिस्टर चढ्ढा यथावत।
कानून व्यवस्था यथावत।
राजपथ यथावत
पगडण्डी यथावत
खड़न्जा यथावत।
यथावत तेरी तो …
.. मालिक से ऊँख का हिसाब करने
चन्नुल चल पड़ा अपना साल बरबाद करने
हरे हरे डालर नोट
उड़ उड़ ठुमकते नोट
चन्नुल आसमान की ओर देख रहा
ऊँची उड़ान
किसान की शान
गन्ना पहलवान । (जारी)            

November 17, 2009 Posted by गिरिजेश राव | गन्ना, नरक | | 20 Comments

नरक के रस्ते – 3


मुझे बेचैन करता है
क़स्बे की सुबह का ऐसे सिमट जाना!
लगता है कि एक नरक में जी रहा हूँ
शायद ठीक से कह भी नहीं पाना
एक नारकीय उपलब्धि है।
कमरे में बदबू है
मछली मार्केट सी।
जिन्दा मछलियाँ जिबह होती हुईं
पहँसुल की धार इत्ती तेज !
जंगी के शरीर में जाने कितनी मछलियाँ
ताजी ऊर्जावान हरदम उछलती हुईं
शीतल आग में धीरे धीरे
फ्राई हो रही हैं
कौन खा रहा है उन्हें ?
कौन है??
चिल्लाता हूँ
भागती अम्माँ आती है
आटा सने हाथ लिए
पीछे बीवी ।
… चादर के नीचे शरीर में दाने निकल आए हैं ।
सुति रह !
कैसे सो जाऊँ ?
ये जो शराब पी कर वह जंगी जी रहा है
जिन्दगी की जंग बिना जाने बिना लड़े
अलमस्त हो हार रहा है।
वह रिक्शे की खड़खड़ जो हो जाएगी खामोश
बस चार पाँच सालों में टायरों को जला जाएगी आग
रह जाएगा झोंपड़ी में टीबी से खाँसता अस्थि पंजर
मैं देख रहा हूँ – कुम्भीपाक में खुद को तल रहा हूँ।
अम्माँ तुम कहती हो – सुति रह !!
मेरे इतिहास बोध में कंफ्यूजन है !
मैं मानता हूँ कि इस मुहल्ले में रहते
ये पढ़े लिखे मास्टर – कोई डबल एम ए कोई विशारद
दुश्मन के सामने तमाशा देखती गारद ।
निर्लिप्त लेकिन अपनी दुनिया में घनघोर लिप्त
करें भी तो क्या परिवार और स्कूल
इन दो को साधना
करनी एक साधना कि
बेटे बेटियों को न बनना पड़े मास्टर।
कोई इतिहासकार न इनका इतिहास लिखेगा
और न जंगी की जंग का
सही मानो तो वह जंग है ही नहीं …
इसका न होना एक नारकीय सच है
समय के सिर पर बाल नहीं
सनातन घटोत्कच है।
गुड्डू जो किलो के भाव बस्ता उठाता है
दौड़ते भागते हँसते पैदल स्कूल जाता है
कॉलेज और फिर रोजगार दफ्तर भी जाएगा
उस समय उसे जोड़ों का दर्द सताएगा
जब कुछ नहीं पाएगा
समानांतर ही धँस जाएंगी आँखें
दीवारों पर स्वप्नदोष की दवाएँ बाँचते
बाप को कोसेगा जुल्फी झारते और खाँसते ।
बाप एक बार फिर जोर लगाएगा
बूढ़े बैल में जान बँची होगी ?
भेज देगा तैयारी करने को – इलाहाबाद
सीधा आइ ए एस बनो बेटा – मुझे मत कोसना ..
मैं अकेला बदबूदार कमरे में
मांस जलने की बू सूँघते
बेशर्म हो हँसते
मन में जोड़ता हूँ ये तुकबन्दी
भविष्य देख रहा हूँ – सोच संकट है।
अर्ज किया है:
”खेतों के उस पार खड़ा
रहता हरदम अड़ा अड़ा
सब कहते हैं ठूँठ ।
बढ़ कर के आकाश चूम लूँ
धरती का भंडार लूट लूँ
कितनी भी हरियाली आई
कोंपल धानी फूट न पाई
चक्कर के घनचक्कर में
रह गया केवल झूठ
सब कहते हैं ठूँठ।
हार्मोन के इंजेक्शन से
बन जाएगी पालक शाल
इलहाबाद के टेसन  से
फास्ट बनेगी गाड़ी माल
आकाश कहाँ आए हाथों में
छोटी सी है मूठ
सब कहते हैं ठूँठ ।
गुलाब कहाँ फूले पेड़ों पर
दूब सदा उगती मेड़ों पर
ताँगे के ये मरियल घोड़े
खाते रहते हरदम कोड़े
पड़ी रेस में लूट (?)
सब कहते हैं ठूँठ”
ये जवानी की बरबादी
ये जिन्दगी के सबसे अनमोल दिनों का
यूँ जाया होना
मुझे नहीं सुहाता।
..कमाल है इस बारे में कोई नहीं बताता।
इस बेतुके दुनियावी नरक में
तुकबन्दी करना डेंजर काम है। (जारी)

November 15, 2009 Posted by गिरिजेश राव | कस्बा, नरक | | 12 Comments

हमहूँ मुक्तिबोध

हमहूँ मुक्ति 
हमहूँ बोध
हमहूँ मुक्तिबोध।
बोधुआ भी कर रहा
मुक्ति पर शोध
जो केहु टोके
करता है किरोध।
हमने कहा छोड़ आगे बढ़
का मुक्तिबोध के बाद कोर्ई नहीं हुआ
उठाया जिसने अभिव्यक्ति का खतरा ?
उसने देखा
हमने जारी रखा अपना फेंका,
अगर ये सच है कि मुक्तिबोध के बाद
तुम्हें कोई नहीं दीखता
तो उनके ही शब्दों में
भारी भयानक सच है।
खतरनाक है।
हिन्दी क्या इतनी बाँझ है?
अगर कोई हुआ है
तो ये जन्मदिन पर क्या हुआँ हुआँ है?
कोई जरूरी है कि किसी को सिरफ
जन्मदिन पर ही याद करो?
फर्ज अदायगी करो
और फिर भूल जाओ अगले साल तक !
बोधुआ रे!
सही कहूँ तो हमको मार्क्सवाद अस्तित्त्ववाद वादबाद
कछु नहीं बुझात है
बुझात है सिरफ कि कामायनी की आलोचना
दूर की कौड़ी है
उनकी सभी लम्बी कविताएँ एक सी लगत हैं
तुम तो उन्हें सबसे बड़ा विचारक बनाए बैठे हो !
हमको तो विजय साही जियादा सही लगत हैं
एतना जो सुना
निकाला बोधुआ ने जूता ..
हमने पकड़ा उसका हाथ
समझाया
उन्हों ने गढ़ मठ तोड़ने की बात कही थी
है कि नहीं ?
उसने जूते की जुतारी भरी
खतरा टला जान हमने बात आगे करी
अब ये बताओ उनके नाम पर
तुम लोग काहे गढ़ मठ रचत हो ?
उसने बकास सा हमरी ओर देखा
हम खुश हुए अपनी झकास पर।
बात आगे बढ़ाई
देखो आँख खोल देखो
पाँच रुपए घंटा माँ
और एकाध सौ घंटा माँ
तुम नेट से जान जाओगे
कि दुनिया बहुते आगे जा चुकी है।
कि गढ़ मठ कुआँ बना
चेहरे पर मुर्दनी सजा
छापो तिलक लगा
राम राम मुक्ति मुक्ति जपत हैं।
हिन्दी मइया तकत हैं
हमका बोध कब होयगा
जे हाल है उस पर किरोध कब होयगा?
रुकी ग्रामोफोन की सुई
डीजे वीजे के जमाने में
मुक्तिबोध के सहारे लगे नौकरी हथियाने में ।
प्यार करो आदर करो
लेकिन उनके घेरे से बाहर चलो
हिन्दी अबहूँ दलिद्दर है
शोध के लिए कछु और चुनो
भूल गए क्या?
“ … मेरे युवकों में होता जाता व्यक्तित्वान्तर,
विभिन्न क्षेत्रों में कई तरह से करते हैं संगर,
मानो कि ज्वाला-पँखरियों से घिरे हुए वे सब
अग्नि के शत-दल-कोष में बैठे !!
द्रुत-वेग बहती हैं शक्तियाँ निश्चयी।“
बोधुआ ने हमरी ओर देखा
जूते को फेंका
चल दिया बड़बड़ाता,
”पागलों के मुँह क्या लगना ?
जूते मार कर भी क्या होगा?”
मैं गली में आगे चल दिया
एक और बोधुआ की तलाश में …   

November 14, 2009 Posted by गिरिजेश राव | Muktibodha, गजानन माधव मुक्तिबोध, व्यंग्य कविता | | 23 Comments

नरक के रस्ते -2

निवेदन और नरक के रस्ते -1  से जारी..
बुखार?

सुख?
37 डिग्री बुखार माने जीवन
तेज बुखार माने और अधिक जीवन
इतना जीवन कि जिन्दगी ही बवाल हो जाए !
यह जीवन मेरे उपर इतना मेहरबान क्यों है?
ooo
बुखार चढ़ रहा है
अजीब सुखानुभूति।
पत्नी से बोलता हूँ –
भला बुखार में भी सुख होता है ?
बड़बड़ाहट समझ चादर उढ़ा
हो जाती है कमरे से बाहर।
ooo
कमरे में एकांत
कोई बताओ – भोर है कि सुबह?
….नानुशोचंति पंडिता:“
कौन इस समय पिताजी के स्वर गा रहा?
क्यों नहीं गा सकता ? सुबह है।
 कमरे में घुस आई है
धूप की एक गोल खिड़की ।
कमाल है आग कहाँ गई?
धूप सचमुच या बहम?
ooo
हँइचो हँइचो हैण्डपम्प
रँभाती गैया
चारा काटने चले मणि
कमरे के कोने में नाच रही मकड़ी
चींटियाँ चटक लड्डू पपड़ी
जै सियराम जंगी का रिक्शा
खड़ंजे पर खड़ खड़ खड़का।
धूँ पीं धूँ SSssS हों ssss
रामकोला की गन्ना मिल
राख उगलती गुल गिल
दे रही आवाज बाँधो रे साज
पिताजी चले नहाने
खड़ाऊँ खट पट खट टक
बजे पौने सात सरपट।
रसोई का स्टोव हनहनाया
सुबह है, कस्बा सनसनाया।
ooo
गोड़न गाली दे रही
बिटिया है उढ़री
काहें वापस घर आई?
बाप चुप्प है
सब ससुरी गप्प है।
बेटियाँ जब भागतीं
घर की नाक काटती
बेटा जब भागता
कमाई है लादता ।
ऐसा क्यों है?
गोड़न तेरी ही नहीं
सारी दुनिया की पोल है,
कि मत्था बकलोल है।
समस्या विकट है
सोच संक्कट्ट है।
ooo
बुखार का जोर है ।
हरापन उतर आया है कमरे में।
कप के काढ़े से निकल हरियाली
सीलिंग को रंग रही तुलसी बावरी।
छत की ओस कालिख पोत रही
हवा में हरियाली है
नालियों में जमी काई
काली हरियाली ..
अचानक शुरू हुई डोमगाउज
माँ बहन बेटी सब दिए समेट
जीभ के पत्ते गाली लपेट
विवाद की पकौड़ी
तल रही नंगी हो 
चौराहे पर चौकड़ी।
रोज की रपट   
शिव बाबू की डपट
से बन्द है होती
लेकिन ये नाली उफननी
बन्द क्यों नहीं होती?
ooo
टाउन एरिया वाले चोर हैं
कि मोहल्ले वाले चोर हैं ?
ले दे के बात वहीं है अटकती
ये नाली बन्द क्यों नहीं होती?
ooo
रोज का टंटा
कितने सुदामा हो गए संकटा।
वह क्या है जो नाली की मरम्मत नहीं होने देता?
इस उफनती नाली में पलते हैं बजबजाते कीड़े
और घरों के कुम्भीपाक 
खौलता तेल आग
ठंढा काई भरा पानी हरियाला  
अजब है घोटाला
कौन हुआ मालामाल है ?
ooo
 धूँ पीं धूँ SSssS हों ssss
ओं sss होंsss कीं हें sss
साढ़े नौ – पंजाब मिल की डबलदार सीटी|
जंगी का रिक्शा फिर खड़का है
अबकी दारू का नशा नहीं भड़का है।
पीढ़े से डकारते पिताजी उठते हैं ।
बगल के घर से हँसी गुप्ता की
तकिए की जगह नोट रखता है
जाने बैंक जाते इतना खुश क्यों रहता है ?
गुड्डू की डेढ़ फीट पीठ पर
आठ किलो का बस्ता चढ़ता है।
इस साढ़े नौ की सीटी से
पूरा कस्बा सिहरता है।
ooo
कैसी इस कस्बे की सुबहे जिन्दगी !
इतने में ही सिमट गई !! (जारी) 

November 13, 2009 Posted by गिरिजेश राव | कुम्भीपाक, नरक, रामकोला | | 10 Comments

.. ये आग नहीं आसाँ

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यह लेख बहुत सरल तरीके से आम जनता और विशेषकर युवा वर्ग को तेल या गैस डिपो में लगने वाली आग के एक अनछुए से पहलू से अवगत कराने के लिए लिखा गया। कृपया तकनीकी बारीकियों की अपेक्षा न रखें।
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आग जिन्दगी है। कोई जिन्दा है कि नहीं, यह उसके शरीर की गर्मी से जाना जाता है। मनुष्य आग जलाना सीखने के बाद ही सभ्य हुआ। इसीलिए दुनिया के सभी पुराने धर्मों में आग को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। ऋग्वेद का पहला सूक्त ही अग्नि को समर्पित है। 
आग को जलाने के लिए तीन चीजें आवश्यक हैं – फ्यूल, ऑक्सीजन और स्पार्क। ये तीन मिलते हैं तो आग पैदा होती है। इन्हें फायर ट्रैंगल भी कहा जाता है। तीनों साइड पूरे हों तो आग लगती है। अगर कोई एक नहीं रहेगा तो आग नहीं जलेगी। इस जानकारी का उपयोग आग को रोकने और उसको बुझाने में किया जाता है।
तेल के डिपो या एक्स्प्लोजिव स्टोरेज में यह प्रयास किया जाता है कि स्पार्क न पैदा हो क्यों कि फ्यूल और ऑक्सीजन तो ऐसी जगहों पर रहते ही हैं। इसीलिए ऐसे स्थानों पर स्मोकिंग, कुकिंग वगैरह वर्जित होते हैं। लाइटिंग और स्विच भी स्पार्करोधी होते हैं और विस्फोटक विभाग के लाइसेंस के बाद ही बनाए जाते हैं।   ऐसी जगहों पर यदि किसी कारण से आग लग गई और शुरू के कुछ मिनटों, जी हाँ मिनटों- घंटों नहीं, में नियंत्रित नहीं हुई तो विस्फोटक होने के कारण उसे बुझाया नहीं जा सकता। असल में हवा गर्म होकर उपर उठती है और खाली स्थान भरने को अगल बगल से हवा जोरों से आती है । इस कारण यह पूरा प्रॉसेस दुगुना चौगुना रफ्तार से बढ़ता जाता है। पानी का कोई असर नहीं होता। प्रोडक्ट के पूरी तरह जल जाने पर ही आग बुझती है। कुछ आधुनिक तकनीकें जैसे विस्फोट कर ऑक्सीजन को आग वाले स्थान पर एकदम समाप्त कर देना बहुत महंगी, कठिन और अप्रभावी साबित हुई हैं। बड़ी स्केल की आग को नियंत्रित करना कितना कठिन है यह इससे समझा जा सकता है कि ऑस्ट्रेलिया जैसा विकसित देश भी अपने जंगलों में लगी आग को नियंत्रित नहीं कर पाता है और वहाँ इससे हाल के वर्षों में बहुत नुकसान हुआ है।  ऐसी आग की सूरत में आबादी खाली कराने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता।
आग से बचाव और नागरिकों की सुरक्षा के लिए ही तेल और एल पी जी डिपो आबादी से बहुत दूर बनाए जाते हैं। लेकिन ऐसी जगहों के चारो ओर रोजगार के अवसर बढने से आबादी बसती जाती है। दुर्भाग्य से भारत में नागरिक जागरूक नही हैं और न ही सरकारें आबादी के बसाव को रोकती हैं। लॉ और ऑर्डर का मामला होने के कारण तेल कम्पनियाँ अपनी बाउंड्री के बाहर आबादी की ऐसी बाढ़ को रोकने के लिए कुछ अधिक नहीं कर पातीं । ऐसी आबादी आग लगने का कारण हो सकती है और आग लगने पर उसका आसान शिकार भी।  
डिपो के भीतर सुरक्षा के तमाम इन्तजामात होते हैं। सुरक्षा के उपर खर्च 30 से 35% तक भी हो जाता है। सारे कर्मचारी आग न लगने देने की सावधानियों और आग पर समय रहते काबू पाने के लिए ट्रेंड होते हैं। शेड्यूल के हिसाब से नियमित रूप से मॉक फायर ड्रिलें होती हैं जिनमें प्रशासन और फायर डिपार्टमेंट भी हिस्सा लेता है। आग लगने पर कौन कर्मचारी क्या करेगा, यह सब पूर्व निर्धारित रहता है। मॉक ड्रिल में इसी हिसाब से कर्मचारी ऐक्शन लेते हैं ताकि हादसा होने पर किसी तरह का कंफ्यूजन न हो।
सवाल यह है कि इतनी तैयारी के बाद भी आग लग कैसे जाती है? ऐसे समझिए कि सावधानियों के चलते ही आग की घटनाएँ बहुत कम होती हैं नहीं तो जिस तरह के प्रोडक्ट होते हैं, उनसे बार बार आग लगे ! गैस या पेट्रोल का हवा के साथ मिश्रण बहुत ज्वलनशील होता है। मानवीय चूक या मशीनरी के फेल्योर से अगर इनका लीकेज बहुत देर तक होता रहे तो ये अदृश्य वेपर क्लाउड  बनाते हैं। यह क्लाउड हवा में तैरता रहता है। इस क्लाउड में ऑक्सीजन और फ्यूल का एक निश्चित अनुपात होने पर जरा सी चिनगारी कहर मचा सकती है क्यों कि पूरा क्लाउड एकदम से आग पकड़ता है। अब आप कहेंगे कि चिनगारी आएगी कहाँ से? होता यह है कि हवा के साथ यह अदृश्य क्लाउड बहुत दूर तक डिपो की  बाउंड्री के पार भी चला जा सकता है।  अब यदि आबादी में कहीं किसी ने  कुछ सुलगाया तो आग क्लाउड को पकड़ डिपो तक आ जाती है और फिर तबाही पक्की ! इसीलिए डिपो के चारो ओर आबादी का हिस्सा न बनें और दूसरों को भी ऐसी बस्ती न बनाने के लिए चेताएँ।
अब तो आप समझ ही गए होंगें, ये आग नहीं आसाँ ।                

November 13, 2009 Posted by गिरिजेश राव | आग, एल पी जी, डिपो, तेल | | 12 Comments

नरक के रस्ते – 1

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मुक्ति पानी ही है
चाहे गुजरना पड़े
हजारो कुम्भीपाकों से ।…
यह कविता नहीं, जाने क्या है। क्यों लिख रहा हूँ? मन अभी तक साफ नहीं है। असल में यह भूत को दुबारा जीने सा है। सम्भवत: पहले के इस लेख से आप कुछ समझ पाएँ। कविता का कंफ्यूजन कहीं आज से भी जुड़ता सा है। आदमी की जान पर बहुत बवाल हैं।
कहीं धिक्कार है कि पाठकों को क्यों तकलीफ दे रहे हो? लेकिन यह सब साझा होना चाहिए, इस चाह का क्या करूँ? लिहाजा स्वार्थी हो कर पोस्ट कर रहा हूँ। आप के उपर पढ़ना या छोड़ना; टिपियाना या न टिपियाना छोड़ता हूँ। पता है कि यह कथन भी बेहूदा और ग़ैरजरूरी है लेकिन जो है सो है। 
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तकिया गीली है।
आँखें सीली हैं?
आँसू हैं या पसीना ?
अजीब मौसम
आँसू और पसीने में फर्क ही नहीं !
…… कमरे में आग लग गई है।
आग! खिड़कियों के किनारे
चौखट के सहारे दीवारों पर पसरी
छत पर दहकती सब तरफ आग !
बिस्तर से उठती लपटें
कमाल है यह – एकदम ठंडी
लेकिन शरीर के अन्दर इतनी जलन खुजली क्यों?
दौड़ता जा रहा हूँ
हाँफ रहा हूँ – बिस्तर के किनारे कमरे में कितने ही रास्ते
सबमें आग लगी हुई
साथ साथ दौड़ते कुत्तों के अग्नि पिल्ले
यह क्या ? किसने फेंक दिया मुझे खौलते तेल के कड़ाहे में?
भयानक जलन खाल उतरती हुई
चीखती हुई सी गलाघोंटू बड़बड़ाहट
झपट कर उठता हूँ
शरीर के हर किनारे ठंढी आग लगी हुई
पसीने से लतपथ . . निढाल पसर जाता हूँ
पत्नी का चेहरा मेरे चेहरे के उपर
आँखों में चिंन्ता – क्या हुआ इन्हें ?
अजीब संकट है
स्नेहिल स्त्री का पति होना।
कृतघ्न, पाखंडी, वंचक …. मनोवैज्ञानिक केस !
क्यों सताते हो उस नवेली को ?
…. सोच संकट है। क्या करूँ?
… भोर है कि सुबह?
पूछना चाहता हूँ
आवाज का गला किसने घोंट दिया?
खामोश चिल्लाहट …|
… ”अशोच्यानन्वशोचंते प्रज्ञावादांश्च …..”
पिताजी गा रहे हैं
बेसमझ पारायण नहीं
गा रहे हैं।
… आग अभी भी कमरे में लगी हुई है।
लेकिन शमित हो रहा है
शरीर का अन्दरूनी दाह ।
शीतल हो रही हैं आँखें
सीलन नहीं, पसीना नहीं
..पत्नी का हाथ माथे पर पकड़ता हूँ
कानों में फुसफुसाहट
“लेटे रहिए
आप को तेज बुखार है।“ …
(जारी…)        

November 12, 2009 Posted by गिरिजेश राव | कुम्भीपाक, नरक | | 12 Comments