तन धन …अकिञ्चन
यौवन
तन धन
सजे
सन सन।
शोर शोख
बरजोर बार,
बार लेकिन
कानों में कन कन
तन धन
बजे घन घन।
आँख डोर
बहकन
मन पतंग
तड़पन।
उठन शहर भर
नीक लगत
हवा पर
विचरण
लहकन
तन धन
बिखर छम थम।
लुनाई -
साँवरा बदन
कपोल लाल
अधपके जामुन
रस टपकन
अधर मधुर
मधु भर भर
कान लोर
लाल
शरम रम रम
तन धन
सिमट
कहर बन शबनम।
देह
द्वै कुम्भ काम
दृग विचरें
सप्तधाम
कटि कुलीन
नितम्ब पीन
उतरे क्षीण
जैसे
पश्चात मिलन
पतली पीर
सिमटन
तन धन
…
…
धत्त अकिंचन !
नरक के रस्ते – 5
निवेदन और नरक के रस्ते – 1
नरक के रस्ते – 2
नरक के रस्ते – 3
नरक के रस्ते – 4 से जारी….
पुरानी रामायण – 1
(1) जरा मंत्रणा करते सुग्रीव, वानर समाज और राम लक्ष्मण को देखिए! बैकग्राउण्ड के दो शिखर दोनों भाइयों के कोमल आनुपातिक शरीरों को पौरुष की गरिमा दे रहे हैं। डीटेलिंग न्यून रखते हुए चित्रकार कैसे वानर वीरों के शरीर सौष्ठव को उभार रहा है !!
(2) समुद्र लाँघते हनुमान की विराटता देखिए! समुद्र की लहरों में रेखाओं के घुमाव, चाप और अपूर्णवृत्तवत वक्र रेखाएँ भारत की सनातन कलाकारी को दर्शाती हैं। इस कलाकारी ने एक तरफ तो अनगढ़ ब्राह्मी लिपि को सुन्दर आकार दिए तो दूसरी तरफ खजुराहो की मूर्तियाँ भी दीं।
(3),(4),(5) सीता के सौन्दर्य को निरखिए – मूर्तिमान पवित्रता ! उत्तर भारतीय नारी का गरिमामय सौन्दर्य और सखी सरमा अपने सारे रक्ष सौन्दर्य के साथ कितनी आत्मीय है!!
(6) अशोकवाटिका का विध्वंश करते मारुति का पौरुष, उल्लास और कौतुक निरखिए! पेंड़, भागते राक्षस और मन्दिर सभी कितने लघु हो गए हैं!!
(7) रावण की सभा में राक्षसों का चित्रांकन तो अति उत्तम है लेकिन भव्यता सादगी के आगे पराजित हो गई है। पर्सपेक्टिव का दोष है क्या?
(8) सीता को ढूढ़ कर लौटते वानर समूह, भ्राताद्वय और सुग्रीव का चित्रांकन अद्भुत है। घने छाए बादलों के बीच से प्रकट होता वानर समूह राम, लक्ष्मण और सुग्रीव की मन:स्थिति से एकदम से जुड़ रहा है। पात्रों के चित्रांकन के तो क्या कहने !
(9) समुद्र को शासित करते राम का यह रूप ! सोचता हूँ कि फिर कोई चित्रकार बना पाएगा!! समुद्र की लहरों की उठान श्रीराम के क्रोध से कैसे मिल सी जा रही है और उनके मध्य दीन सा समुद्र। मैं अभिभूत रह जाता हूँ।
(10) राम से मिलने आते विभीषण के इस चित्र में वानर समूह की मुद्राओं का सौन्दर्य कितना स्वाभाविक लगता है !
(11) कुम्भकर्ण को जगाने का यह दृश्य बहुत कमजोर प्रस्तुति है। भैंसे, राक्षस, हाथी वगैरह सब एक ही आकार के ! चित्रकार महोदय चूक गए !
(12) कुम्भकर्ण वध के इस दृश्य में राम और हनुमान के लाघव और गति का चित्रण दर्शनीय है।
(13) संजीवनी लाते हनुमान के इस चित्र में हताशा, आशा और कौतुहल एक साथ दिखते हैं।
(14) गरुड़, राम और लक्ष्मण का सजीव चित्रण !
(15) मेघनाद वध के इस दृश्य में लक्ष्मण और हनुमान की क्षिप्रता और लाघव को निरखिए।
(16) इन्द्र सारथी मातलि और श्रीराम के इस रंगीन चित्र में सब कुछ साधारण है।
(17) हनुमान के कन्धे पर बैठ रावण से युद्ध करते राम के इस चित्र में रावण सारे ऐश्वर्य के बावजूद कितना हास्यास्पद लगता है! राम और हनुमान तो वीरता साक्षात हैं। इस चित्र में भी लैण्डस्केप की न्यूनता और कैनवास का संकुचन इसे साधारण कोटि का बना देता है।
(18) रावण वध के इस दृश्य में बस राम और रावण को देखिए और देखते रह जाइए। कितनी उदारता से चित्रण हुआ है!
(19) विजय के पश्चात विभीषण को वानरों का सत्कार करने का निर्देश देते राम यहाँ चित्रित हुए हैं। यह चित्र मुझे कमजोर लगता है।
(20) लक्ष्मण द्वारा विभीषण के राज्याभिषेक का यह चित्र अवसरोचित गरिमा का वातावरण लिए हुए है। एकबार फिर वैष्णवी सादगी के मोह के कारण कैनवास लघु हो गया है और भव्यता की उपेक्षा हुई है।
(21) ऋषियों द्वारा श्रीराम के अभिनन्दन के इस दृश्य में वैष्णवी गरिमा अपने शिखर पर है।
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22 अक्टूबर 2009 को प्रयोग करते भूलवश यह लेख अधूरा ही प्रकाशित हो गया था। अग्रिम क्षमा की सावधानी के बावजूद यह
पाठक मेरे !
पाठक मेरे!
हाँ मैंने पढ़ी है तुम्हारी हर टिप्पणी
अक्षर, अक्षर , मात्रा , मात्रा
मैंने उनमें लय ढूढ़ने के जतन किए हैं
अपने लिए सम्मान प्यार तिरस्कार सब ढूढ़ा है
पाया है।
वह बेचैनी भी ढूढ़ी है -
काश ! थोड़ा ऐसे लिख दिया होता
क्या बात होती !
कम्बख्त ने कबाड़ा कर दिया।
मैंने पाया है कई बार
स्तब्ध मौन – जब तुम बिना कुछ कहे चले गए।
वह स्पष्ट निन्दा बघार
मेरे स्वर व्यंजन – व्यंजन स्वाद।
सब सवादा है।….
पाठक मेरे !
मैं मानता हूँ
तुम भी पढ़ते होगे मुझे इसी तरह।
नरक के रस्ते – 4
निवेदन और नरक के रस्ते – 1
नरक के रस्ते – 2
नरक के रस्ते – 3 से जारी..
नरक के रस्ते – 3
हमहूँ मुक्तिबोध
हमने कहा छोड़ आगे बढ़
अगर ये सच है कि मुक्तिबोध के बाद
बोधुआ रे!
हमने पकड़ा उसका हाथ
विभिन्न क्षेत्रों में कई तरह से करते हैं संगर,
मानो कि ज्वाला-पँखरियों से घिरे हुए वे सब
अग्नि के शत-दल-कोष में बैठे !!
द्रुत-वेग बहती हैं शक्तियाँ निश्चयी।“
नरक के रस्ते -2
निवेदन और नरक के रस्ते -1 से जारी..
बुखार?
बुखार चढ़ रहा है
.. ये आग नहीं आसाँ
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यह लेख बहुत सरल तरीके से आम जनता और विशेषकर युवा वर्ग को तेल या गैस डिपो में लगने वाली आग के एक अनछुए से पहलू से अवगत कराने के लिए लिखा गया। कृपया तकनीकी बारीकियों की अपेक्षा न रखें।
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